Wednesday, 16 August 2017

देशभक्ति का सबूत

मैन लोगों से सुना है कि बेवकूफ लोगों के सवाल का सबसे अच्छा जवाब है चुप रहना जिससे कि मैं भी सहमत हूँ।
पिछले कुछ सालों से सवाल बहुत होने लगे हैं।
आम आदमी सरकार से सवाल करता है तो सरकार चुप रहती है। सरकार को आम आदमी का सवाल बेवकूफों वाला लगता है और लगे भी क्यों नहीं, जब हमने सरकार को 15 लाख रुपए और मंदिर मस्जिद के नाम पे वोट दिया है तो हम उनसे महंगाई और पढ़ाई का सवाल पूछें ही क्यों।
मेरा ये लेख दूसरे सवालों के लिए है जो कुछ फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी लोग देश के मुसलमानों से पूछ रहे हैं , आज हर कदम पे मुसलमान को एक हिंदुस्तानी होने का सबूत देने को कहा जाता है , फिर वो चाहे भारत माता की जय बोलना हो या वन्देमातरम या मदरसों में वीडियो शूट करने की बात।
मैं उन फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों से कुछ कहना ही नही चाहता क्यों की मेरा भी यही मानना है कि बेवकूफ के सवाल का जवाब चुप रहना है।
मैं बस यही बात देश के मुसलमानों को बताना चाहता हूं कि जिनके सामने वो अपनी देशभक्ति दिखा रहे हैं दरअसल वो इस काबिल ही नहीं।
और आपको क्या लगता है कि आप उनको देशभक्ति दिखाओगे और वो आपको पसंद करने लग जाएंगे?
अगर ऐसा सोचते हो तो नादान हो।
पुरानी हिंदी फिल्मों में देखा है कभी? हीरो (नायक) को किसी ग़लत मुक़दमे में फसा कर उससे अपने अच्छे होने का सबूत मांगा जाता है , सबूत मांगने वाला कत्तई नही चाहता कि हीरो को सबूत मिले , और अगर कहीं से सबूत मिल भी गया तो विलीन उस सबूत को झुठलाने की पूरी कोशिश करता है। और अगर सबूत झुठला नही पाता तो हीरो के वकील का खून करवा देता है।अब यही बात आज हिंदी मुसलमानो के साथ हो रही है।
पर यहां पे ना सामने वाला वकील असली है ना जज और ना ही तुमपर लगाए गए इल्ज़ाम। तो बंद करो अपने आप को साबित करना , क्यों कि तुम जितना साबित करोगे तुमसे उतना ही सबूत मांग जाएगा और तबतक मांगा जाएगा जबतक तुम थक कर अपना जुर्म कबूल ना कर लो जो तुमने किया भी नही।
जितना मैं समझा हूँ उतना आपको समझाने की कोशिश की है।
ये ज़रूरी नहीं कि मैं जो सोचता हूँ वो आप भी सोचो या मेरा सोचना सही है या ग़लत , मैं जो सोचता हूँ वो मैंने लिख दिया। आप चाहें तो अपनी सोच मेरे साथ शेयर कर सकते हैं।
धन्यवाद

#WordsOfAzam

मैं भी तन्हा हुँ , है मेरा घर तन्हा

मैं भी तन्हा हुँ , है मेरा घर तन्हा
बिन तेरे हैं ये शाम-ओ-सहर तन्हा।
मंज़िल पे मिलेंगे मेरे अपने बहुत
मगर करना है पूरा ये सफर तन्हा।
तेरे आने की कोई उम्मीद तो नहीं
राह देखेंगे फिर भी उम्र भर तन्हा।
इश्क़ हो जाये तो फिर चैन कहाँ
भटकते हैं लोग दर ब दर तन्हा।
दिन तो गुज़ार लेते हैं जैसे तैसे
अश्क़ बहाते हैं रात भर तन्हा ।
आते हैं अकेले ही सभी लोग यहां
और ज़िन्दगी भी करते हैं बसर तन्हा।
धागा बांधते हैं जिसपर हमसफर के लिए
खड़ा खुद ही रहता है वो शजर तन्हा ।
क्या खूब ज़िन्दगी है "आज़म" की
रहता है दुनिया से बेखबर तन्हा।

Main bhi tanha hun, hai mera ghar tanha
Bin tere hain ye sham-o-saher tanha
Manzil pe milenge mere apne bahut
Magar karna hai pura ye safar tanha
Tere aane ki koi umeed to nahi
Raah dekhenge fir bhi umr bhar tanha
Ishq ho jaye to fir chain kahan
Bhatakte hain log dar ba dar tanha
Din to guzaar lete hain jaise taise
Ashq bahate hain raat bhar tanha
Aate hain akele hi sabhi log yahan
Aur zindagi bhi karte hain basar tanha
Dhaga bandhate hain jispar humsafar ke liye
Khada khud hi rehta hai wo shajar tanha
Kya khoob zindagi hai "Azam" ki
Rehta hai duniya se bekhabar tanha.


Monday, 14 August 2017

हम आज़ाद हैं

वो बच्चे हमसे कुछ कह रहे हैं जिनको हम ऑक्सीजन नही दे सके।

हम आज़ाद हैं
इस दुनिया से आज़ाद
इन लोगों से आज़ाद
ना हमे धर्म का डर
ना हमे जाति का डर
ना लड़की होने का डर
हमारी साँस रुक कर
हमे हर चीज़ से आज़ाद कर गयी
आक्सीजन की कमी से नही
इंसानियत की कमी से मरे हैं हम
अनजाने में ही सही
हम मर कर जी गए
ऐसे समाज मे जीना
मौत से भी बदतर है
जहाँ इंसान-इंसान के खून का प्यासा है
हमारे क़ातिल तुम्हारा शुक्रिया
तुमने हमे आज़ादी दी
अब तुम भी मनाओ
अपनी आज़ादी ।

क्या हम आज़ाद हैं?

क्या हम आज़ाद हैं?
किस बात की आज़ादी और कैसा जश्न? आज़ादी का मतलब होता क्या है? कभी किसी आज़ाद पंछी को देखा है ,  चाहे हवा उसके साथ हो या उसके खिलाफ वो अपनी परवाज़ अपने मन से ही करता है उसे जिस दिशा में जाना होता है वो उसी दिशा में जाता है फिर हवा उसके साथ चले या उसके खिलाफ उसे फ़र्क़ नही पड़ता। हाँ उसकी रफ्तार धीमी हो सकती है लेकिन उसकी परवाज़ बंद नही होती।
आज़ादी का मतलब होता है आज़ाद सोच, आज़ाद जिस्म नहीं । आज़ादी से पहले भी लोग आज़ाद थे, वो लोग जो जेलों में बंद थे वो आज़ाद थे वो लोग जो देश के लिए सूली पे चढ़ रहे थे वो आज़ाद थे वो लोग जिनके सीनों को गोलियों से भर दिया गया था वो लोग आज़ाद थे । अगर कोई गुलाम था तो वो थे जो खुद को गुलाम समझते थे और अंग्रेजों के सामने अपने घुटने टेक दिए थे। जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे वो ग़ुलाम थे। अगर आपकी सोच आज़ाद है तो आपको सात सलाखों के अंदर बंद करके भी गुलाम नही बनाया जा सकता।
लेकिन अफसोस कि बात है कि आज हम आज़ाद होते हुए भी ग़ुलाम है। हमारी सोच राजनीतिक पार्टियों की ग़ुलाम बनकर रह गयी हैं।
हर रोज़ कहीं न कहीं कोई ना कोई इस गुलाम मानसिकता का शिकार हो रहा है। किसी को धर्म के नाम पे किसी को जाति के नाम पे तो किसी को महिला होने की सज़ा मिल रही है।
हमे क्या खाना है क्या पहनना है , किसको कहाँ जाना चाहिए कहाँ नही सब उनके हाथ मे है जिनको हमने ही चुना है। फिर भी ना जाने हम किस नशे में होकर जश्ने आज़ादी मना रहे हैं।
हम आज़ाद उस दिन होंगे जिस दिन किसी रोहित को अपनी जाति की वजह से खुदखुशी ना करनी पड़े , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब किसी अख्लाक के मरने पे मांस की जांच के बदले लाश की जाँच हो , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब हमारे देश की बेटियां बाहर निकलने से पहले दिन रात ना देखें और ना उनके दिल मे कोई ख़ौफ़ हो। हम आज़ाद उस दी होंगे जब वोट मंदिर, मस्जिद, शमशान और कब्रिस्तान के नाम पर मांगना बंद हो जाये। जब ज़ात-पात, ऊंच-नीच, धर्म , स्त्री और पुरुष जैसे शब्दों को हम किसी की पहचान ना बनाएं , तो आज़ादी का जश्न भी मना लेंगे वो भी आज़ाद सोच के साथ। अगर इस लेख को पढ़ते वक्त आप मेरी जाति या मेरे धर्म का अनुमान लगाने लगे थे तो आप आज़ाद नही हैं , और हमें आज़ादी इसी सोच से चाहिये।
जय हिंद जय भारत