क्या हम आज़ाद हैं?
किस बात की आज़ादी और कैसा जश्न? आज़ादी का मतलब होता क्या है? कभी किसी आज़ाद पंछी को देखा है , चाहे हवा उसके साथ हो या उसके खिलाफ वो अपनी परवाज़ अपने मन से ही करता है उसे जिस दिशा में जाना होता है वो उसी दिशा में जाता है फिर हवा उसके साथ चले या उसके खिलाफ उसे फ़र्क़ नही पड़ता। हाँ उसकी रफ्तार धीमी हो सकती है लेकिन उसकी परवाज़ बंद नही होती।
आज़ादी का मतलब होता है आज़ाद सोच, आज़ाद जिस्म नहीं । आज़ादी से पहले भी लोग आज़ाद थे, वो लोग जो जेलों में बंद थे वो आज़ाद थे वो लोग जो देश के लिए सूली पे चढ़ रहे थे वो आज़ाद थे वो लोग जिनके सीनों को गोलियों से भर दिया गया था वो लोग आज़ाद थे । अगर कोई गुलाम था तो वो थे जो खुद को गुलाम समझते थे और अंग्रेजों के सामने अपने घुटने टेक दिए थे। जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे वो ग़ुलाम थे। अगर आपकी सोच आज़ाद है तो आपको सात सलाखों के अंदर बंद करके भी गुलाम नही बनाया जा सकता।
लेकिन अफसोस कि बात है कि आज हम आज़ाद होते हुए भी ग़ुलाम है। हमारी सोच राजनीतिक पार्टियों की ग़ुलाम बनकर रह गयी हैं।
हर रोज़ कहीं न कहीं कोई ना कोई इस गुलाम मानसिकता का शिकार हो रहा है। किसी को धर्म के नाम पे किसी को जाति के नाम पे तो किसी को महिला होने की सज़ा मिल रही है।
हमे क्या खाना है क्या पहनना है , किसको कहाँ जाना चाहिए कहाँ नही सब उनके हाथ मे है जिनको हमने ही चुना है। फिर भी ना जाने हम किस नशे में होकर जश्ने आज़ादी मना रहे हैं।
हम आज़ाद उस दिन होंगे जिस दिन किसी रोहित को अपनी जाति की वजह से खुदखुशी ना करनी पड़े , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब किसी अख्लाक के मरने पे मांस की जांच के बदले लाश की जाँच हो , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब हमारे देश की बेटियां बाहर निकलने से पहले दिन रात ना देखें और ना उनके दिल मे कोई ख़ौफ़ हो। हम आज़ाद उस दी होंगे जब वोट मंदिर, मस्जिद, शमशान और कब्रिस्तान के नाम पर मांगना बंद हो जाये। जब ज़ात-पात, ऊंच-नीच, धर्म , स्त्री और पुरुष जैसे शब्दों को हम किसी की पहचान ना बनाएं , तो आज़ादी का जश्न भी मना लेंगे वो भी आज़ाद सोच के साथ। अगर इस लेख को पढ़ते वक्त आप मेरी जाति या मेरे धर्म का अनुमान लगाने लगे थे तो आप आज़ाद नही हैं , और हमें आज़ादी इसी सोच से चाहिये।
जय हिंद जय भारत
किस बात की आज़ादी और कैसा जश्न? आज़ादी का मतलब होता क्या है? कभी किसी आज़ाद पंछी को देखा है , चाहे हवा उसके साथ हो या उसके खिलाफ वो अपनी परवाज़ अपने मन से ही करता है उसे जिस दिशा में जाना होता है वो उसी दिशा में जाता है फिर हवा उसके साथ चले या उसके खिलाफ उसे फ़र्क़ नही पड़ता। हाँ उसकी रफ्तार धीमी हो सकती है लेकिन उसकी परवाज़ बंद नही होती।
आज़ादी का मतलब होता है आज़ाद सोच, आज़ाद जिस्म नहीं । आज़ादी से पहले भी लोग आज़ाद थे, वो लोग जो जेलों में बंद थे वो आज़ाद थे वो लोग जो देश के लिए सूली पे चढ़ रहे थे वो आज़ाद थे वो लोग जिनके सीनों को गोलियों से भर दिया गया था वो लोग आज़ाद थे । अगर कोई गुलाम था तो वो थे जो खुद को गुलाम समझते थे और अंग्रेजों के सामने अपने घुटने टेक दिए थे। जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे वो ग़ुलाम थे। अगर आपकी सोच आज़ाद है तो आपको सात सलाखों के अंदर बंद करके भी गुलाम नही बनाया जा सकता।
लेकिन अफसोस कि बात है कि आज हम आज़ाद होते हुए भी ग़ुलाम है। हमारी सोच राजनीतिक पार्टियों की ग़ुलाम बनकर रह गयी हैं।
हर रोज़ कहीं न कहीं कोई ना कोई इस गुलाम मानसिकता का शिकार हो रहा है। किसी को धर्म के नाम पे किसी को जाति के नाम पे तो किसी को महिला होने की सज़ा मिल रही है।
हमे क्या खाना है क्या पहनना है , किसको कहाँ जाना चाहिए कहाँ नही सब उनके हाथ मे है जिनको हमने ही चुना है। फिर भी ना जाने हम किस नशे में होकर जश्ने आज़ादी मना रहे हैं।
हम आज़ाद उस दिन होंगे जिस दिन किसी रोहित को अपनी जाति की वजह से खुदखुशी ना करनी पड़े , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब किसी अख्लाक के मरने पे मांस की जांच के बदले लाश की जाँच हो , हम आज़ाद उस दिन होंगे जब हमारे देश की बेटियां बाहर निकलने से पहले दिन रात ना देखें और ना उनके दिल मे कोई ख़ौफ़ हो। हम आज़ाद उस दी होंगे जब वोट मंदिर, मस्जिद, शमशान और कब्रिस्तान के नाम पर मांगना बंद हो जाये। जब ज़ात-पात, ऊंच-नीच, धर्म , स्त्री और पुरुष जैसे शब्दों को हम किसी की पहचान ना बनाएं , तो आज़ादी का जश्न भी मना लेंगे वो भी आज़ाद सोच के साथ। अगर इस लेख को पढ़ते वक्त आप मेरी जाति या मेरे धर्म का अनुमान लगाने लगे थे तो आप आज़ाद नही हैं , और हमें आज़ादी इसी सोच से चाहिये।
जय हिंद जय भारत
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